दीपावली

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दीपावली

दीपावली: हिंदू कैलेंडर के अनुसार कार्तिक मास की अमावस  की रात को मनाया जाता है दीपावली. दीपावली के दिन दीपों से जगमगाता नगर और गांव तथा आसमान में इंद्रधनुषी  छटाएं बिखेरता फुलझड़ी एवं अन्य आतिशबाजी मानव मात्र के ह्रदय के हर्ष का प्रतीक है.. प्रकाश का पर्व दीपावली भारत के सबसे बड़े उत्सवों  में से एक है.

दीपावली शब्द का यदि हम  संधि विच्छेद करें तो यह होता है दीप + अवली . दीप यानी कि दिया अथवा दीपक और अवली संस्कृत भाषा का स्त्रीलिंग शब्द है जिसका अर्थ होता है पंक्ति अथवा पाँत . कार्तिक अमावस्या के दिन हमारा आस पड़ोस दीपकों की पंक्तियों से जगमगाता रहता है…शायद इसलिए इस त्यौहार को हम दीपावली है. 

मनाते क्यों हैं दीपावली

हम भारतवासी  उत्सवधर्मी लोग हैं.हमारे भारतवर्ष में ऐसा एक भी पर्व नहीं है जिसके पीछे कोई किंवदंती नहीं हो .दीपावली के लिए भी बहुत सारे हैं.

दीपावली को लगभग संपूर्ण हिंदू जनमानस किसी न किसी रूप में मनाता है. ऐसा माना जाता है कि भगवान राम आसुरी शक्तियों के प्रतीक राजा रावण को पराजित कर इसी दिन अयोध्या पधारे थे. उनके स्वागत में अयोध्या वासियों ने अपने घरों  एवं अपने नगर के सभी रास्तों को दीप-मालिकाओं से रौशन कर दिया.ताकि उनके प्रिय राम को आने में तकलीफ नहीं हो . तभी से भगवान राम की अयोध्या वापसी की स्मृति में दीपावली मनाया जाता है.असत्य पर सत्य की विजय,अंधकार पर प्रकाश की विजय के प्रतीक स्वरूप इस त्यौहार को मनाया जाता है.

दूसरा पक्ष

इसे अगर हम अपने सामाजिक सरोकारों से जोड़कर देखें तो हमारा समाज पहले कृषि प्रधान था.दीपावली के समय खरीफ फसल बनकर तैयार हो जाती है.घर धन-धन्य से पूरित होने की ख़ुशी में शायद लोग सैकड़ों हजारों वर्ष पूर्व जो खुशी मनाते होंगे, उसी  उत्सव ने एक त्यौहार का रूप ले लिया होगा.जिसे आज हम दीपावली कहतें हैं.

दीपावली पर्व का स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी एक अलग महत्व है. यह चूँकि वर्षा ऋतु के पश्चात मनाया जाने वाला त्यौहार है. वर्षा ऋतु में हमारे परिवेश में हमारे आसपास विभिन्न प्रकार के जीव एवं कीटाणुओं का संक्रमण ज्यादा हो जाता है. 

आसपास झाड़ियां बड़ी हो जाती हैं और बारिश के कारण पत्तों और अन्य चीजों को सड़ने की वजह से गंदगी भी एकत्रित हो जाती है. दीपावली में हम अपने आसपास की सभी गली-मोहल्लों  और अपने घरों की सफाई करते हैं. जिससे हमारे आसपास का वातावरण बहुत ही स्वच्छ एवं स्वास्थ्यवर्धक हो जाता है. मच्छरों एवं कीट पतंगों के आतंक से मुक्ति मिल जाती है.





त्यौहार की अवधि

दीपावली त्यौहार की शुरुआत धनतेरस से होती है, और समाप्ति भ्रातृद्वितीया से होता है. देश के कुछ हिस्सों में तो दीपावली के लगभग छठे दिन छठ महापर्व मनाया जाता है.  

धनतेरस 

धनतेरस से जो त्योहारों का जो वातावरण शुरू होता है वह धीरे धीरे अपने उरुच पर जाता है .धनतेरस के दिन लोग सोने चांदी का सामान अथवा यथासामर्थ्य कुछ न कुछ बर्तन खरीदतें हैं.ऐसा माना जाता है कि इससे  घर में प्रगति आती है. 

नरका-चतुर्दशी 

इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर नामक दैत्य का संहार किया था .नरकासुर के उत्पात  से जनता त्रस्त थी और उसकी मृत्यु पर लोगों ने खुशी के मारे घी के दिए जलाए. इसे भी दीपोत्सव मानाने के कारणों में गिना जाता है.

दीपावली 

इसके बारे में हमने पूरा आलेख लिखा है . इस दिन माता लक्ष्मी की पूजा आराधना की जाती है. परिवार के सभी सदस्य नए वस्त्र पहनते हैं.सायंकाल अपने-अपने घरों में दीप जलाने के पश्चात परिवार के सभी सदस्य मिलकर माता की आराधना करते हैं और उनसे आने वाले समय में जीवन में सुख समृद्धि  का आशीर्वाद मांगते हैं.

गोवर्धन-पूजा

इस दिन भगवान कृष्ण ने अपनी उंगली पर गोवर्धन पर्वत को उठाया था. भगवन कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाकर देवताओं के राजा इंद्र के अहंकार को  तोड़ा था.

इस दिन श्रमजीवी भूमिपुत्र किसान अपने सभी उपकरणों यथा: – हल,फावड़ा,तथा कृषिकर्म में उपयोग होने वाले अन्य साजोसामान  की पूजा करते हैं. इस दिन मवेशियों के उपयोग में आने वाले रस्से आदि को बदला जाता है . उन्हें रंगो एवं अन्य चीजों से सजाया जाता है . इस दिन किसान अपने मवेशियों के साथ उपकरणों का धन्यवाद करता है.

दक्षिण भारत के लोग इस दिन को बलिप्रतिपदा के रूप में मनाते हैं. बलिप्रतिपदा के दिन को अत्यंत दानी  दानव राज बलि के ऊपर भगवान वामन की विजय की स्मृति में मनाया जाता है.

भ्रातृद्वितीया 

भ्रातृद्वितीया भाई-बहन के प्रेम का पावन त्यौहार है. जिसे संपूर्ण भारतवर्ष सदियों से मनाता चला आ रहा है. बहन भ्रातृद्वितीया के दिन भाई को चंदन तिलक लगाकर भगवान से उनके दीर्घायु और स्वस्थ होने की कामना करती हैं. भाई भी यथासामर्थ्य अपनी बहन को उपहार देता है. 

भ्रातृ द्वितीया के साथ ही समाप्त हो जाता है दीपावली का उत्सव. हालांकि भारत के कुछ हिस्सों में जैसा कि हमने ऊपर जिक्र किया था बिहार, उत्तर प्रदेश में इसके बाद छठ महापर्व मनाया जाता है.





पूजा-पाठ

दीपावली पर्व हमारे मन में अनंत खुशियां लेकर आता है. दीपावली के दिन लक्ष्मी माता की पूजा की जाती है. माता से आने वाले साल में धनधान्य से परिपूर्ण करने का आशीर्वाद मांगा जाता है. 

विद्वान पुरुष बताते हैं कि ब्रह्मपुराण में इस बात का उल्लेख है की कार्तिक अमावस्या की इस घनघोर अंधेरी रात में माता महालक्ष्मी  का आगमन इस भू-लोक पर होता है. मां प्रत्येक गृहस्थ के घर में विचरण करती हैं और जहां भी साफ-सफाई, स्वच्छता, प्रकाश, एवं भक्ति भाव को उच्चतम स्तर पर देखती है वहां एक अंश के रूप में ठहर जाती हैं.दीपावली पर अपने घर एवं आसपास को साफ करने के पीछे एक कारण यह भी है.

ऐसी धारणा है की दीपावली के दिन भगवान विष्णु माता लक्ष्मी और विघ्नहर्ता श्री गणेश की पूजा-अर्चना से गृहस्थ संकटों से मुक्त हो जाता है और घर में खुशहाली  आती है.

परिवार के सभी  सदस्य नए-नए वस्त्र पहनता है. शाम में पूजा के पश्चात सुस्वाद व्यंजनों का आनंद लिया जाता है. दुनियां कितनी भी अंग्रेजी क्यों न हो गयी हो लेकिन आज भी हमारे छोटे-बड़े दुकानदार अपने बही खातों की शुरुआत इसी पवित्र दिन से करतें हैं. 

उत्सव

दीपावली हमारे जीवन और परिवेश में रौनक लेकर आता है. हम अपने घरों की सफाई  करने के साथ-साथ दरवाज़ों खिड़कियों और रोशनदानों पर रंग-रोगन करते हैं. दीपावली के कुछ दिन पहले से ही बाजारों की शोभा बहुत निराली होती है . हलवाईयों की मिठाइयों  की बड़ी-बड़ी दुकानें सजी रहती हैं. बाजार में बर्तनों और सोने चांदी की दुकानों पर ग्राहकों की भारी भीड़ होती है. दीपावली के दिन लोग अपने परिचित मित्रों एवं संबंधियों से मिलने -जुलने के लिए उनके घरों तक जाते हैं.

दीपावली का असली आनंद तो आता है शाम होते ही घुप अंधेरे में जलती हुई   दीप मालिकाओं को देखकर. जैसे-जैसे अंधेरा गहराता है दीपों की लड़ियों की शोभा अत्यंत मनमोहक होती है. अपने सामर्थ्य के अनुसार लोग अपने घरों और अपने आसपास को प्रकाश स्रोत से सजाते हैं.  आज तो गांव-गांव बिजली है. ऐसे में क्या गांव क्या नगर. रंग-बिरंगी लड़ियों और रंगीन बल्बों से सराबोर वातावरण को देखकर ऐसे लगता है जैसे स्वर्ग धरती पर उतर आया हो.

फुलझड़ी  पटाखों और बमों की मिली-जुली  ध्वनि और प्रकाश साथ में बच्चों की किलकारियां एक अलग ही समा बांधती हैं. लक्ष्मी पूजन के बाद बतासे सहित अन्य मिठाइयों का आनंद लेते हुए अपनों से मिलते हैं, तो ऐसा लगता है मानो  जीवन में बस आनंद ही आनंद है.दीपावली के आनंद का वर्णन शब्दों में करना शायद संभव नहीं है. 

पाखंड और भ्रांतियां

दीपावली में सब कुछ अच्छा हो, ऐसा ही नहीं है! जैसा हर एक त्यौहार में होता है दीपावली के साथ भी कुछ मनगढ़ंत पाखंड और भ्रांतियां जुड़ी हुई हैं . कुछ नासमझ लोगों ने इस त्यौहार में भी बुराई जोड़ दिया है . कुछ लोग इस दिन जुआ खेलते हैं . वह मानते हैं जुआ खेल कर जीतने से लक्ष्मी जी की कृपा उन पर होगी. लेकिन जुए में एक पक्ष हारता है और दूसरा जीता है. हारने वाले पक्ष की घर की खुशियों का तो सर्वनाश ही हो जाएगा ना. त्यौहार जीवन में आनंद का उत्सव मनाने के लिए होता है. जहां पर हम खुद  प्रसन्न रहकर दूसरों को प्रसन्न रखने की कोशिशें करते हैं. हमारे आचरण से, क्रियाकलाप से किसी को दुख हो तो फिर इसमें त्यौहार की मूलभूत भावना का अनादर होता है.

दीपावली त्यौहार है अपने जीवन में निराशा रुपी अंधकार से बहार निकल कर उम्मीदों  का दामन थामने का. दीपावली आनंद का त्यौहार है. दीपावली आपस में खुशियों को बांटने का त्यौहार है. अतः दीपावली में आनंद मनाते हुए इस बात का जरूर ध्यान रखना चाहिए कि हमारे  क्रियाकलाप से किसी भी प्राणिमात्र को दु:ख नहीं पहुंचे. इसी में दीपावली त्यौहार को मनाने की सार्थकता है. 

आप को दीपावली -2019  की अनंत-अशेष शुभकामनएं….

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